14 और 15 अगस्त 1947 की वह मध्यरात्रि, जब पूरी दुनिया सो रही थी, भारत अपनी नई आजादी और संप्रभुता के उजाले में कदम रख रहा था। लाल किले के प्राचीर से गूंजते “नियति से साक्षात्कार” (Tryst with Destiny) के जोशीले शब्द एक नए राष्ट्र के उदय का शंखनाद कर रहे थे। लेकिन उसी रात, दिल्ली से सैकड़ों मील दूर पंजाब की पांचों नदियां और बंगाल के हरे-भरे खेत आंसुओं और खून से लाल हो रहे थे। एक तरफ आजादी का जश्न था, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी साझी तहजीब, साझे आंगन और साझी विरासत का कत्ल हो रहा था।
1947 का बंटवारा केवल दो मुल्कों के बीच जमीन का विभाजन नहीं था; यह इंसानी रूहों, परिवारों, रिश्तों और दिलों का वह निर्मम चीर-हरण था, जिसकी मिसाल आधुनिक मानव इतिहास में मिलना नामुमकिन है। यह दास्तान है उस सियासी जल्दबाजी, मजहबी उन्माद और मानवीय त्रासदी की, जिसके घाव आज सात दशक बाद भी पूरी तरह भर नहीं पाए हैं।
विभाजन की पृष्ठभूमि: सदियों के भाईचारे में कैसे घुला नफरत का जहर?
भारत का विभाजन अचानक घटी कोई एक दिन की घटना नहीं थी, बल्कि यह लंबे समय तक बोए गए वैमनस्य के बीजों का जहरीला फल था। ब्रिटिश हुकूमत ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद यह भली-भांति समझ लिया था कि अगर भारत पर राज करना है, तो यहां के दो सबसे बड़े समुदायों—हिंदू और मुस्लिम—के बीच की एकता को तोड़ना अनिवार्य है। इसी समझ से जन्म हुआ अंग्रेजों की कुख्यात ‘फूट डालो और राज करो’ (Divide and Rule) की नीति का।
1905 का बंगाल विभाजन इसी सोच की पहली खुली आजमाइश थी। यद्यपि जन-आंदोलन के दबाव में अंग्रेजों को बंगाल विभाजन वापस लेना पड़ा, लेकिन वे 1906 में ‘मुस्लिम लीग’ की स्थापना और 1909 के ‘मार्ले-मिंटो सुधारों’ के जरिए अलग निर्वाचन मंडल (Separate Electorate) का बीज बोने में सफल रहे। इस व्यवस्था ने भारतीय राजनीति में धर्म को एक प्रमुख सियासी हथियार बना दिया।
1930 के दशक तक आते-आते यह दरार और चौड़ी हो गई। 1940 में मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में आधिकारिक रूप से ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (Two-Nation Theory) पेश किया, जिसमें दावा किया गया कि हिंदू और मुसलमान केवल दो अलग धर्म नहीं, बल्कि दो अलग राष्ट्र हैं जिनका एक साथ रहना संभव नहीं है।
1946 का ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ (प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस) इस नफरत की पराकाष्ठा साबित हुआ। कोलकाता की सड़कों पर शुरू हुआ भयानक कत्लेआम देखते ही देखते नोआखली, बिहार, रावलपिंडी और पूरे पंजाब में दावानल की तरह फैल गया। राजनीति के बंद कमरों में चलने वाले शह-मात के खेल ने आम जनता के हाथों में खंजर थमा दिए थे।
रेडक्लिफ रेखा: अनजान कलम से खींची गई खूनी लकीर
फरवरी 1947 में जब लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का अंतिम वायसराय बनाकर भेजा गया, तो ब्रिटिश सरकार ने सत्ता हस्तांतरण के लिए जून 1948 की समय-सीमा तय की थी। लेकिन माउंटबेटन ने अप्रत्याशित जल्दबाजी दिखाते हुए इस तारीख को लगभग दस महीने पहले—15 अगस्त 1947—खिसका दिया। इस जल्दबाजी ने प्रशासनिक तंत्र को संभलने का कोई मौका नहीं दिया।
सीमाओं के निर्धारण का काम सौंपा गया एक ब्रिटिश वकील सर सिरिल रेडक्लिफ को। त्रासद विडंबना यह थी कि रेडक्लिफ इससे पहले कभी भारत नहीं आए थे। उन्हें यहां की संस्कृति, भूगोल, जनसांख्यिकी, भाषा और सामाजिक ताने-बाने का शून्य ज्ञान था। उन्हें पंजाब और बंगाल के करोड़ों इंसानों के भविष्य का फैसला करने के लिए महज 5 हफ्तों का वक्त दिया गया।
रेडक्लिफ ने पुराने नक्शों और पुरानी जनगणना की फाइलों के सहारे मेज पर बैठकर एक नीली पेंसिल से नक्शे पर लकीर खींच दी। यह लकीर इतनी बेपरवाह थी कि इसने खेतों को घरों से, कुओं को आंगनों से और यहां तक कि एक ही घर के रसोईघर को बैठक से अलग कर दिया। करतारपुर साहिब और ननकाना साहिब जैसे पवित्र धार्मिक स्थल सीमा के उस पार चले गए, तो लाहौर—जो पंजाब की सांस्कृतिक आत्मा था—रातों-रात पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।
सबसे भयावह बात यह रही कि रेडक्लिफ अवॉर्ड (सीमा निर्धारण का फैसला) 15 अगस्त तक सार्वजनिक ही नहीं किया गया। 15 अगस्त को जब लोग आजादी का जश्न मना रहे थे, तब लाहौर, अमृतसर, सियालकोट और गुरदासपुर के लाखों लोगों को यह पता ही नहीं था कि वे किस देश के नागरिक हैं। जब 17 अगस्त को सीमाओं की घोषणा हुई, तो चारों तरफ चीख-पुकार मच गई।
इतिहास का सबसे बड़ा जबरन पलायन: अपनी ही धरती पर बेगाने
सीमाओं की घोषणा होते ही इंसानी इतिहास का सबसे बड़ा और खूनी पलायन शुरू हुआ। लगभग 1.4 से 1.5 करोड़ लोग रातों-रात अपनी ही पुरखों की जमीन पर अजनबी और शरणार्थी बन गए। जो मकान पीढ़ियों से उनके थे, वे पराए हो गए; जो पड़ोसी कल तक सुख-दुख के साथी थे, वे खून के प्यासे बन गए।
धूल भरे रास्तों पर मीलों लंबे काफिले निकल पड़े, जिन्हें ‘काफिला’ कहा जाता था। एक-एक काफिले में पचास-पचास हजार, एक-एक लाख लोग अपनी गृहस्थी की बची-खुची पोटली सिर पर उठाए, बच्चों की उंगली थामे पैदल चल रहे थे। उस समय भयंकर बारिश हो रही थी, नदियां उफान पर थीं और रास्तों में हैजा और भुखमरी पैर पसारे बैठी थी। जो थक कर बैठ जाता, वह वहीं छूट जाता; जो बच्चा मां के हाथ से छूट जाता, वह भीड़ के पैरों तले कुचल जाता।
रास्ते लाशों से पटे पड़े थे। गिद्धों और आवारा कुत्तों के लिए इंसानी मांस का कभी न खत्म होने वाला अकाल पड़ गया था। इंसान अपनी जान बचाने के लिए अपने सदियों पुराने संचित धन, जेवर, मकान, मवेशी सब कुछ पीछे छोड़ आया था।
मौत की रेलगाड़ियां: जब पटरियों पर बहने लगा खून
बंटवारे के सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाले प्रतीक थे—’भूतिया ट्रेनें’ या ‘मौत की रेलगाड़ियां’। जो लोग पैदल चलने में असमर्थ थे, वे जैसे-तैसे रेलवे स्टेशनों पर पहुंचे। रेल के डिब्बों के भीतर जगह नहीं थी, तो लोग छतों पर बैठ गए, पायदानों और बोगियों के बीच के पायदानों पर लटक गए।
लेकिन ये रेलगाड़ियां सुरक्षित सफर का जरिया नहीं बनीं, बल्कि मौत का फंदा बन गईं। रास्ते में उन्मादी भीड़ ट्रेनों को जंगलों और आउटर सिग्नलों पर रोक लेती थी। इसके बाद शुरू होता था एकतरफा कत्लेआम। पुरुषों और बच्चों को काट डाला जाता था। जब ये गाड़ियां लाहौर से अमृतसर या अमृतसर से लाहौर पहुंचती थीं, तो प्लेटफॉर्म पर केवल खामोशी उतरती थी।
गाड़ी के डिब्बे लाशों से ठसाठस भरे होते थे और बोगियों के नीचे से खून टपक कर पटरियों पर बह रहा होता था। कई बार इंजनों पर कोयले से लिखा होता था—*”आजादी का तोहफा”। स्टेशन मास्टर जब डिब्बों के दरवाजे खोलते, तो उन्हें जिंदा इंसानों की जगह केवल कटे हुए अंग और चीखती हुई खामोशी मिलती थी।
औरतों का जिस्म, कौम की ‘इज्जत’: बर्बरता की मूक शिकार
विभाजन की हिंसा में सबसे ज्यादा और सबसे क्रूर कीमत महिलाओं ने चुकाई। धर्म और कौम की झूठी ‘इज्जत’ का बदला औरतों के शरीरों पर लिया गया। एक अनुमान के मुताबिक, विभाजन के दौरान 75,000 से 1,00,000 महिलाओं का अपहरण किया गया, उनके साथ सामूहिक बलात्कार किए गए, उनके स्तनों को काट दिया गया और उनके शरीरों पर दूसरे मजहब के धार्मिक चिन्ह गोद दिए गए।
इस वहशीपन से बचने के लिए कई जगहों पर खुद परिवारों ने अपनी बहू-बेटियों को मौत के घाट उतार दिया। पंजाब के रावलपिंडी जिले के ‘थोआ खालसा’ गांव की घटना इतिहास के पन्नों पर दर्ज एक दहला देने वाला सच है, जहां सिख समुदाय की 90 से अधिक महिलाओं और युवतियों ने अपनी अस्मत बचाने के लिए सामूहिक रूप से एक गहरे कुएं में छलांग लगा दी थी। कुआं लाशों से इतना भर गया था कि बाकी बची लड़कियों के कूदने के लिए उसमें पानी ही नहीं बचा था।
पिता ने अपनी ही बेटियों के गले पर तलवार चला दी ताकि वे दंगाई भीड़ के हत्थे न चढ़ें, और भाइयों ने अपनी बहनों को जहर की पुड़िया थमा दी। विभाजन ने पुरुषवादी नफरत का वह नंगा नाच देखा, जिसने इंसानियत के हर उसूल को तार-तार कर दिया।
आंकड़ों के आईने में तबाही का मंजर
विभाजन से हुई तबाही का कोई सटीक सरकारी आंकड़ा कभी नहीं बन सका, लेकिन इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुमान रूह कंपा देने वाले हैं:
| पहलू | अनुमानित आंकड़े |
| विस्थापित लोगों की संख्या | 1.4 करोड़ से 1.5 करोड़ (14-15 मिलियन) |
| मारे गए लोगों की संख्या | 5 लाख से 15 लाख तक |
| अपहृत और प्रताड़ित महिलाएं | 75,000 से 1,00,000 |
| शरणार्थी शिविरों की संख्या | पंजाब और बंगाल में सैकड़ों विशाल शिविर |
| विभाजन का दायरा | मुख्य रूप से पंजाब और बंगाल, आंशिक रूप से सिंध |
साहित्य और कला में विभाजन की गूंज
इतिहासकार अक्सर संख्याओं, तारीखों और संधियों की बात करते हैं, लेकिन विभाजन के असली मानवीय दर्द को उस दौर के साहित्यकारों और कवियों ने अपनी कलम से अमर किया।
उर्दू के महान कथाकार सआदत हसन मंटो ने इस दौर के पागलपन को अपनी कहानियों में उकेरा। उनकी अमर कहानी ‘टोबा टेक सिंह’ का मुख्य पात्र बिशन सिंह पागलों की अदला-बदली के दौरान समझ ही नहीं पाता कि उसका गांव पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में। अंततः वह दोनों देशों की कंटीली तारों के बीच की लावारिस जमीन (No Man’s Land) पर गिरकर दम तोड़ देता है। मंटो लिखते हैं:
“उस तरफ जमीन के टुकड़े के पीछे हिंदुस्तान था और इस तरफ उसी तरह के जमीन के टुकड़े के पीछे पाकिस्तान। बीच में जमीन के उस टुकड़े पर, जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था।”
मंटो की ही कहानी ‘खोल दो’ विभाजन के उस वहशीपन को उजागर करती है जहां एक बदहवास लड़की ‘खिड़की खोल दो’ की आवाज सुनकर अपने सलवार का नाड़ा खोल देती है—यह दिखाता है कि दरिंदगी ने इंसानी जेहन पर क्या असर डाला था।
पंजाबी की महान कवयित्री अमृता प्रीतम ने विभाजन के दर्द से तड़पकर वारिस शाह (हीर-रांझा के रचयिता) को पुकारते हुए लिखा था:
“अज्ज आखां वारिस शाह नूं, कितों कबरां विच्चों बोल!
ते अज्ज किताब-ए-इश्क दा, कोई अगला वरका फोल!
इक रोई सी धी पंजाब दी, तूं लिख-लिख मारे वैन,
अज्ज लक्खां धीयां रोंदियां, तैनूं वारिस शाह नूं कहन…”
(आज मैं वारिस शाह से कहती हूं कि अपनी कब्र से बोलो और इश्क की किताब का कोई नया पन्ना खोलो। जब पंजाब की एक बेटी रोई थी तो तुमने पूरी महागाथा लिख दी थी, आज पंजाब की लाखों बेटियां रो रही हैं और तुम्हें पुकार रही हैं।)
वहीं, फैज अहमद फैज ने 15 अगस्त की सुबह को देखकर लिखा था:
“ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर,
वो इंतिज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं…”
अनसुलझे घाव और आज का परिदृश्य
1947 का बंटवारा सिर्फ जमीन पर खिंची एक लकीर भर नहीं था, इसने आने वाली पीढ़ियों के मानस पटल पर कभी न मिटने वाला अविश्वास और कटुता का जहर बो दिया। कश्मीर की अनसुलझी समस्या, 1948, 1965, 1971 और 1999 के युद्ध, परमाणु हथियारों की होड़ और दोनों देशों के बीच लगातार बना तनाव—यह सब उसी विभाजन की विषैली विरासत है।
दोनों तरफ के वे बुजुर्ग जो अपनी जड़ों से उखड़कर आए थे, जीवन भर अपनी पुरानी गलियों, अपने पुश्तैनी घरों, अपने दोस्तों और अपने बचपन के पेड़ों को याद करते-करते इस दुनिया से रुखसत हो गए। लाहौर का कोई लाला अमृतसर के पापड़-वड़ियों को याद करता रहा, तो दिल्ली का कोई बुजुर्ग पुरानी दिल्ली की गलियों और अपनी छूटी हुई हवेली के लिए सिसकता रहा। वाघा बॉर्डर पर लगने वाली लोहे की जालीदार खिड़कियों के आर-पार जब कभी बिछड़े हुए रिश्तेदार मिलते हैं, तो शब्द खत्म हो जाते हैं और सिर्फ आंसुओं की भाषा बहती है।
इतिहास से सबक: नफरत के खिलाफ एक चेतावनी
1947 का बंटवारा मानव इतिहास का वह अध्याय है जो चीख-चीख कर यह चेतावनी देता है कि जब धर्म, जाति या नस्ल के नाम पर राजनीति की जाती है, और जब उन्माद मानवीय विवेक पर हावी हो जाता है, तो उसका परिणाम सिर्फ और सिर्फ बर्बादी होता है।
विभाजन की इस खूनी दास्तान को याद रखना किसी पुरानी नफरत को ताजा करने के लिए नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि आने वाली नस्लें कभी उस अंधे मोड़ पर न खड़ी हों जहां धर्म इंसानियत से बड़ा हो जाए और पड़ोसियों के हाथ एक-दूसरे के खून से रंग जाएं। 1947 के उन बेकसूर लाखों शहीदों और बेघर हुए करोड़ों मासूमों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम शांति, सह-अस्तित्व और साझी इंसानियत के मूल्यों को हर कीमत पर सहेज कर रखें।